Tuesday, April 19, 2011

बुध ग्रह



  • बुध ग्रह ( Mercury ) सूर्य से सबसे पहला / पास का ग्रह है और द्रव्यमान में आंठवा सबसे बडा ग्रह है और गुरुत्वाकर्षण शक्ति पृथ्वी की अपेक्षा एक चौथाई है। यह सौर मंडल का सबसे छोटा ग्रह है, जिसके पास कोई उपग्रह नहीं है। बुध ग्रह का व्यास 4880 किमी जो सौर मंडल में दो चन्द्रमा गुरु का गेनीमेड और शनि का टाईटन व्यास में बुध से बडे है लेकिन द्रव्यमान में आधे हैं। बुध सामान्यतः नंगी आंखो से सूर्यास्त के बाद या सूर्योदय से ठीक पहले ( दो घंटा पहले ) देखा जा सकता है। बुध सूर्य के काफ़ी समीप होने से इसे देखना मुश्किल होता है।

  • रोमन मिथको के अनुसार बुध वाणिज्य, व्यापार, यात्रा और चोर्यकर्म का देवता हैं। युनानी देवता हर्मीश का रोमन रूप, देवताओ का संदेशवाहक देवता है। इसे संदेशवाहक देवता का नाम इस कारण मिला क्योंकि यह ग्रह आकाश में काफ़ी तेजी से गमन करता है। बुध को ईसा से 3 सहस्त्राब्दि पहले सूमेरीयन काल से जाना जाता रहा है। इसे कभी सूर्योदय का तारा, कभी सूर्यास्त का तारा कहा जाता रहा है। ग्रीक खगोल विज्ञानियो को ज्ञात था कि यह दो नाम एक ही ग्रह के हैं। हेराक्लीटस यहां तक मानता था कि बुध और शुक्र पृथ्वी की नही, सूर्य की परिक्रमा करते हैं। बुध पृथ्वी की तुलना में सूर्य के समीप है इसलिये पृथ्वी से उसकी चन्द्रमा की तरह कलाये दिखायी देती है। गैलीलीयो की दूरबीन छोटी थी जिससे वे बुध की कलाये देख नहीं पाये लेकिन उन्होंने शुक्र की कलायें देखी थी।

  • अभी तक दो अंतरिक्ष यान मैरीनर 10 तथा मैसेन्जर बुध ग्रह जा चूके है। मैरीनर - 10 सन 1974 तथा 1975 के मध्य तीन बार इस ग्रह की यात्रा कर चूका है। बुध ग्रह की सतह के 45% का नक्शा बनाया जा चुका है। ( सूर्य के काफ़ी समीप होने से हब्ब्ल दूरबीन उसके बाकी क्षेत्र का नक्शा नहीं बना सकती है। ) मैसेन्जर यान 2004 में नासा द्वारा प्रक्षेपित किया गया था। यह यान भविष्य में 2011 में बुध की परिक्रमा करेगा। इसके पहले जनवरी 2008 में इस यान ने मैरीनर 10 द्वारा न देखे गये क्षेत्र की उच्च गुणवत्ता वाली तस्वीरे भेंजी थी।

  • बुध की कक्षा काफ़ी ज़्यादा विकेन्द्रीत ( eccentric ) है, इसकी सूर्य से दूरी 46,000000 किमी ( perihelion ) से 70,000000 किमी ( aphelion ) तक ( कक्षा = 57,910,000 किमी ( 0.38 AU ) सूर्य से ) रहती है। जब बुध सूर्य के नजदिक होता है तब उसकी गति काफ़ी धिमी होती है। 19 वी शताब्दि में खगोलशास्त्रीयो ने बुध की कक्षा का सावधानी से निरिक्षण किया था लेकिन न्युटन के नियमो के आधार पर वे बुध की कक्षा को समझ नहीं पा रहे थे। बुध की कक्षा न्युटन के नियमो का पालन नहीं करती है। निरिक्षित कक्षा और गणना की गयी कक्षा में अंतर छोटा था लेकिन दशको तक परेशान करनेवाला था। पहले यह सोचा गया कि बुध की कक्षा के अंदर एक और ग्रह (वल्कन) हो सकता है जो बुध की कक्षा को प्रभवित कर रहा है। काफ़ी निरिक्षण के बाद भी ऐसा कोई ग्रह नहीं पाया गया। इस रहस्य का हल काफ़ी समय बाद आईन्स्टाईन के साधारण सापेक्षतावाद के सिद्धांत ( General Theory of Relativity ) ने दिया। इस सिद्धांत से गणना करने पर आये आंकडे ,निरिक्षण से प्राप्त आंकडो से मेल खा रहे थे। बुध की कक्षा की सही गणना इस सिद्धांत के स्वीकरण की ओर पहला कदम था।

  • बुध 48 किलोमीटर ( 29 मील ) प्रति सेकंड की रफ्तार से यह 88 दिनों में सूर्य की परिक्रमा कर लेता है, जो सबसे कम समय है। इसे अपनी धुरी पर एक चक्कर लगाने में 60 दिन लगते हैं। 1962 तक यही सोचा जाता था कि बुध का एक दिन और वर्ष एक बराबर होते है जिससे वह अपना एक ही पक्ष सूर्य की ओर रखता है। यह उसी तरह था जिस तरह चन्द्रमा का एक ही पक्ष पृथ्वी की ओर रहता है। लेकिन डाप्लर सिद्धाण्त ने इसे ग़लत साबीत कर दिया। अब यह माना जाता है कि बुध के दो वर्ष में तीन दिन होते हैं। अर्थात बुध सूर्य की दो परिक्रमा में अपनी स्व्यं की तीन परिक्रमा करता है। शुक्र की तरह बुध का घुर्णन धीमा है। बुध और मंडल में अकेला पिंड है जिसका कक्षा / घुर्णन का अनुपात 1.1 नहीं है। ( वैसे बहुत सारे पिंडो में ऐसा कोई अनुपात ही नहीं है। )

  • बुध की कक्षा में सूर्य से दूरी में परिवर्तन के तथा उसके कक्षा / घुर्णन के अनुपात का बुध की सतह पर कोई निरिक्षक विचित्र प्रभाव देखेगा। कुछ अक्षांसो पर निरिक्षक सूर्य को उदित होते हुये देखेगा और जैसे जैसे सूर्य क्षितिज से उपर शीर्षबिंदू तक आयेगा उसका आकार बढता जायेगा। इस शीर्षबिंदू पर आकर सूर्य रूक जायेगा और कुछ देर विपरित दिशा में जायेगा और उसके बाद फिर रूकेगा और दिशा बदल कर आकार में घटते हुये क्षितिज में जाकर सूर्यास्त हो जायेगा। इस सारे समय में तारे आकाश में सूर्य से तिन गुना तेजी से जाते दिखायी देंगे। निरिक्षक बुध की सतह पर विभिन्न स्थानो अलग अलग लेकिन विचित्र सूर्य की गति को देखेगा।

  • बुध की सतह पर तापमान 90 डीग्री केल्वीन से 700 डीग्री केल्वीन तक जाता है। शुक्र पर तापमान इससे गर्म है लेकिन स्थायी है। बुध पर एक हल्का ( पतला ) वातावरण है जो मुख्यतः सौर हवा से लगातार प्राप्त होते परमाणुओ से बना है। बुध बहुत गर्म है जिससे इस ग्रह पर ये परमाणु टिक नहीं पाते है और परमाणु उड़कर अंतरिक्ष में चले जाते हैं। जहां पृथ्वी और शुक्र के वातावरण स्थिर है वंही पर बुध के वातावरण का पुननिर्माण होते रहता है।

  • बुध को हमारे चन्द्र्मा का भाई कहा जा सकता है दोनो की सतह पर उलकापात से बने ढेर सारे गढ्ढे ( क्रेटर ) है। लेकिन बुध का घनत्व चन्द्रमा के घनत्व से कहीं ज़्यादा है ( 5.43 ग्राम / घन सेमी और 3.34 ग्राम / घन सेमी ) । बुध की सतह स्थायी है, उस पर परतो में कोई गतिविधी नहीं है। बुध का घनत्व 5.43 ग्राम / सेमी है और यह पृथ्वी के बाद सारे सौर मण्ड्ल में सबसे ज़्यादा घनत्व वाला पिंड है। पृथ्वी का घनत्व उसके गुरुत्वाकर्षण के कारण ज़्यादा है अन्यथा बुध का घनत्व सबसे ज़्यादा होता, बुध का घनत्व उसके लोहे की कोर के कारण है। इससे ऐसा प्रतित होता है कि बुध का लौह केन्द्र पृथ्वी के लौह केन्द्र से बड़ा है, शायद बाकि सभी ग्रहो के के केन्द्र से भी ज़्यादा। बुध की सतह पर सीलीकेट की एक बारीक पपड़ी है। बुध के केन्द्र में 1800 किमी से 1900 किमी व्यास की एक लोहे की गुठली है। सीलीकेट की परत ( पृथ्वी जैसे ही ) 500 किमी से 600 किमी मोटी है। सतह की पपड़ी 100 से 300 किमी की है। शायद लोहे का केन्द्र का कुछ भाग पिघला हुआ है।

  • बुध की सतह पर गढ्ढे काफ़ी गहरे है, कुछ सैकड़ो किमी लम्बे और तीन किमी तक गहरे है। ऐसा प्रतित होता है कि बुध की सतह लगभग 0.1% संकुचित हुयी है। बुध की सतह पर कैलोरीस घाटी है जो लगभग 1300 किमी व्यास की है। यह चन्द्रमा के मारीया घाटी के जैसी है। शायद यह भी किसी धूमकेतु या क्षुद्रग्रह के टकराने से बनी है। इन गड्डो के अलाबा बुध ग्रह में कुछ सपाट पठार भी है जो शायद भूतकाल के ज्वालामुखिय गतिविधीयो से बने है। मैरीनर से प्राप्त आंकड़े बताते है कि बुध पर कुछ ज्वालामुखिय गतिविधीयां है लेकिन इसे प्रमाणित करने कुछ और आंकड़े चाहिये। आश्चर्यजनक रूप से बुध के उत्तरी ध्रुवो के गड्डो में पानी की बर्फ के प्रमाण मीले है। बुध पर हल्का सा चुंबकिय क्षेत्र है जो पृथ्वी के चुंबकिय क्षेत्र की क्षमता का 1% है। बुध का कोई भी ज्ञात चन्द्रमा नहीं है।

  • कुछ अनसुलझे प्रश्न -- 
1. बुध का घनत्व पृथ्वी के घनत्व के जैसा 5.43 ग्राम/सेमी ज़्यादा है। लेकिन यह हमारे चंद्रमा से ज़्यादा मिलता जूलता है। क्या किसी टक्कर से इसकी चटटाने नष्ट हो गयी थी ?
2. बुध की सतह पर लोहे की उपस्थिती नहीं है लेकिन इसकी कोर लोहे की बनी है। यह विचित्र है। क्या बुध अन्य चट्टानी ग्रहो से अलग है ?
3. बुध के समतल पठार कैसे बने ?
4. क्या बुध के उस हिस्से में कुछ आश्चर्य छीपा है जिसे हम देख नहीं पाये है? कम गुणवत्ता की तस्वीरो में ऐसा कुछ नहीं पाया है लेकिन ?

[संपादन]अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के अंतरिक्ष यान मैसेंजर का बुध ग्रह अभियान

अंतरिक्ष यान मैसेंजर बुध ग्रह पर पहुंचा
अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के कार के आकार के एक अंतरिक्ष यान मैसेंजर का प्रक्षेपण 2004 में किया गया था। इसे बुध की सतह, भू-रसायन और अंतरिक्ष पर्यावरण का अध्ययन करना था । मैसेंजर सोमवार, अक्तूबर 6, 2008 को बुध ग्रह की महज 200 किलोमीटर की परिधि में पहुंच गया था और 07 अक्टूबर 2008 को पहली बार सौर मंडल के सबसे छोटे ग्रह बुध के सतह की क़रीब से तस्वीर लेने में सफलता हासिल कर ली थी । अंतरिक्ष यान मैसेंजर ने सूर्य के सबसे क़रीब स्थित इस ग्रह की भूमध्य रेखा के नजदीक क़रीब 200 किलोमीटर की दूरी से उड़ान भरी थी । यान के साथ भेजे गए तीन फ्लाइबाइ उपकरणों में से दूसरा उपकरण बुध की कक्षा में स्थापित होने के लिए छोड़ दिया गया था। वैज्ञानिकों का मानना है कि इस यान द्वारा भेजी गई तस्वीरें बुध ग्रह की अब तक की सबसे बेहतरीन तस्वीरें हैं। मार्च 1975 में मैरिनर-10 की तीसरी और अंतिम उ़ड़ान के बाद से यह पहली बार है जब कोई अंतरिक्ष यान बुध की सतह के इतने क़रीब से गुजरा है। यह अंतरिक्ष यान उन तीन यानों में से एक है जो वर्ष 2011 तक बुध की कक्षा में प्रवेश करने जा रहा है।

मेसैंजर द्वारा बुध ग्रह की ली गई तस्वीरें
मैकनट ने कहा यान ने बुध के क़रीब 30 प्रतिशत हिस्से की 1200 तस्वीरें ले ली हैं जिसे पहले किसी यान से देखा नहीं गया था। यान ने सब कुछ वैसे ही किया जैसा कि इसे करना था। मेसैंजर को क़रीब 2011 में बुध की कक्षा में पहुंचने से पहले तीन बार इसके सतह के क़रीब पहुंचना है। इससे पहले यह 14 जनवरी को भी इसके क़रीब पहुंचा था। सितंबर 2009 में इसे एक बार फिर यह अभियान पूरा करना है। श्री मैकनट ने बताया कि इससे पहले 1974 और 1975 में नासा का ही यान मैरिनर 10 तीन बार बुध के क़रीब पहुंचा था और उसने क़रीब 45 प्रतिशत हिस्से की तस्वीरें ली थीं। मैसेंजर ने जनवरी में बुध के 20 और प्रतिशत हिस्से की तस्वीरें लीं । क़रीब 23 हजार 800 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से उड़ान भर रहा मैसेंजर दक्षिण अफ्रीका के आकार के बराबर बुध के क्षेत्र का अध्ययन कर रहा है। बुध का मात्र पांच प्रतिशत हिस्सा ही इसकी नजरों से बच सकेगा। मेसेंजर खोजी यान के कैमरों और उपकरणों ने कई रंगीन तस्वीरें इकट्ठा की हैं जिससे ग्रह की और 6 प्रतिशत सतह का पता चलता है जो इससे पहले इतनी नज़दीकी से कभी नहीं देखी गई थी। मेसेंजर यान बुध ग्रह की 98 प्रतिशत सतह देख चुका है जिसके दौरान उसे एक गह्वर के चारों ओर का चमकदार क्षेत्र भी दिखाई दिया है जो संभवत ज्वालामुखी रहा होगा। उसे दोहरे छल्ले वाला अपेक्षाकृत युवा कुंड भी मिला है जिसका व्यास 290 किलोमीटर है. इस खोजी दल की सदस्य ब्रेट डेनेवी इसकी व्याख्या करते हुए कहते हैं, ग्रह भू-विज्ञानियों के लिए युवा का मतलब कोई एक अरब साल पुराना हुआ क्योंकि बुध ग्रह के अन्य कुंड तीन अरब साल पुराने हैं।

बुध ग्रह का सतह और ज्वालामुखी
खगोलविदों में बुध की सतह के चिकनी होने को लेकर दशकों से बहस जारी है और अब तक बुध को सूर्य के सर्वाधिक क़रीब की एक चट्टान और नीरस ग्रह कहते आए थे लेकिन एमआईटी की वैज्ञानिक मारिया जुबेर का कहना है कि बुध कहीं ज़्यादा दिलचस्प है। जॉन्स हॉपकिन्स युनिवर्सिटी के भौतिकी प्रयोगशाला के वैज्ञानिक राल्फ मैकनट ने बताया कि शुरूआती तस्वीरों से पता लगा है कि बुध की सतह पर चट्टानी मैदान, गहरे गड्ढे तथा लम्बी और ऊंचीं खडी चट्टाने हैं। इसका आकार पृथ्वी के एक तिहाई के बराबर तथा हमारे चांद से थोडा सा ही बड़ा है। पहले ऐसा माना जाता था कि बुध ग्रह की सतह का आकार बाहरी तत्व तय करते हैं, लेकिन इस ग्रह के नजदीक से गुजरे अंतरिक्ष यान से मिले ताजा आंकड़ों के आधार पर वैज्ञानिकों ने कहा है कि यह आकार वहां मौजूद सक्रिय ज्वालामुखी तय करते हैं। वैज्ञानिकों ने बुध की सतह पर भी चंद्रमा और मंगल ग्रह की तरह की संरचनाएँ देखी हैं और उनका कहना है कि यह भारी मात्रा में निकले लावा के कारण हो सकता है। उनका कहना है कि इससे पता चलता है कि वहां तीन से चार अरब साल पहले ज्वालामुखी संबंधी गतिविधियों की भरमार रही होंगीं। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के प्रोब मैसेंजर से भेजी गई नई तस्वीरों में बुध की सतह पर ज्वालामुखियों के गड्ढे साफ दिखाई दे रहे हैं।
बुध ग्रह के सपाट मैदानों के उद्भव को लेकर विवाद 1972 के अपोलो 16 मिशन के साथ शुरू हो गया था। इस मिशन के बाद यह बात सामने आई थी कि कुछ मैदानी हिस्सा उस पदार्थ से बना जो ब्रह्मांडीय टक्करों के कारण छिटक गया था और फिर इससे सपाट तालाब बन गए। जब अंतरिक्ष यान मैरीनर 10 ने सौर मंडल के सबसे छोटे बुध ग्रह की 1975 में ऐसी ही आकृतियों की तस्वीरें ली तो कुछ वैज्ञानिकों का मानना था कि ग्रह पर कुछ प्रक्रियाएं जारी हैं। कुछ अन्य वैज्ञानिकों का अनुमान था कि बुध ग्रह का मैदानी पदार्थ ज्वालामुखी विस्फोट से निकला लावा है लेकिन उस मिशन के दौरान ली गई तस्वीरों में ज्वालामुखी के दहानों या ज्वालामुखी के कारण दिखाई पड़ने वाली अन्य परिघटनाओं के न होने के चलते इस विचार पर आम राय नहीं बन पाई। लेकिन अब अनुसंधानकर्ताओं ने ग्रह के कोलारिस बेसिन नामक स्थान के किनारे - किनारे ज्वालामुखी गतिविधियों का पता लगाया है। उन्होंने यह भी पाया कि कोलारिस का भौगोलिक इतिहास वैज्ञानिकों की पूर्व अवधारणा से कहीं अधिक जटिल है। ग्रह पर ऊंचाई जानने के लिए पहली बार की गई गणनाओं से पता लगा कि यहां पाए गए गड्ढे पृथ्वी के चंद्रमा पर पाए जाने वाले गड्ढों से कुछ ही उथले हैं। इन गणनाओं में बुध ग्रह के जटिल भौगोलिक इतिहास का भी पता लगा है।

बुध ग्रह पर लोहे और टाइटेनियम
नासा के खोजी यान मेसेंजर ने पाया है कि बुध ग्रह पर लोहे और टाइटेनियम का बड़ा संग्रह है. इससे पहले यह माना जाता था कि बुध ग्रह को ढकने वाले सिलिकेट खनिज में थोड़ी मात्रा में लोहा है। मेसेंजर खोजी अभियान के प्रमुख शॉन सोलोमन ने कहा, यह लोहा ऐसे रूप में मौजूद है जो हमें अन्य ग्रहों में नहीं मिलता इसलिए हमारे भू-रसायन शास्त्रियों और शैल-विज्ञानियों को और काम करना होगा। इसके अलावा ग्रहों के निर्माण के मौजूदा सिद्धांतों को भी इस जानकारी पर ध्यान देना होगा. क्योंकि कुछ सिद्धांतो के अनुसार बुध ग्रह मुख्य रूप से उस पिंड का केंद्रीय अवशेष है जिसकी ऊपरी परतें निर्माण के आरंभिक काल में एक ज़बरदस्त भिड़ंत के कारण अलग हो गई थीं।
बुध ग्रह में सिकु़ड़न
अंतरिक्षायान मैसेंजर के भेजे आँक़ड़ों के आधार पर वैज्ञानिकों ने कहा है कि हमारे सौर मंडल का सबसे छोटा ग्रह बुध सिकु़ड़कर और छोटा हो गया है। उल्लेखनीय है कि पहले हमारे ग्रह का सबसे छोटा ग्रह प्लूटो था लेकिन उसे सौरमंडल से बाहर कर दिए जाने के बाद अब बुध ग्रह हमारे सौरमंडल का सबसे छोटा सदस्य रह गया है। बुध के पास से गुज़र रहे अंतरिक्षयान मैंसेंजर ने जनवरी 2008 में जो आँक़ड़े भेजे थे उससे पता चलता है कि बुध का व्यास कोई डे़ढ़ किलोमीटर तक कम हो गया है। वैज्ञानिकों का मानना है कि ग्रह के किनारों के ठंडा होने की वहज से इसका आकार घट गया है। साइंस जर्नल में प्रकाशित शोध के मुताबिक इसकी वजह से बुध का चुंबकीय क्षेत्र भी मजबूत हुआ है। यह एक ऐसा विषय है जिस पर वैज्ञानिक लंबे समय से चर्चा करते रहे हैं। कार्नेगी इंस्टिट्यूशन ऑफ वॉशिंगटन के स्याँ सोलोमन प्रमुख शोधकर्ता का कहना है कि ठंडक ब़ढ़ने के कारण न केवल ग्रह की चुंबकीय शक्ति ब़ढ़ी है बल्कि इसके चलते ग्रह का आकार भी घटा है। उनका कहना है कि ग्रह की सिकु़ड़न पहले लगाए गए अनुमान की तुलना में कम से कम एक तिहाई अधिक है। बुध ग्रह के नजदीक से गुजरे अंतरिक्ष यान मैसेंजर ने जानकारी दी है कि इस ग्रह का चुंबकीय क्षेत्र पिघली हुई सतह से बनता है और ग्रह की चुंबकीय शक्ति इसके भीतरी भाग और सतह में बेहद गतिशील और जटिल प्रतिक्रिया करती है।

बुध ग्रह का वातावरण
मेसेंजर खोजी यान ने बुध ग्रह के वायुमंडल का नया मापन भी किया है. बुध का वायुमंडल अत्यंत सूक्ष्म अणुओं के बादलों से बना है जो सौर गतिविधियों और क्षुद्र उल्का पिंडों के टकराने के कारण ग्रह की सतह से उठते हैं। पृथ्वी से 770 लाख किलोमीटर दूर स्थित सूर्य के ताप में तपते इस ग्रह की सतह के रासायनिक संगठन के बारे में भी पहली बार वैज्ञानिकों को जानकारी मिली है। अंतरिक्ष यान मैसेंजर ने बुध ग्रह के पतले वातावरण की संरचना की जांच की, ग्रह के निकट आवेशयुक्त कणों या आयनों के नमूने लिए और प्रेक्षण तथा ग्रह की सतह पर मौजूद पदार्थो के बारे में नए संबंधों का प्रदर्शन किया। अंतरिक्ष यान ने बुध ग्रह की अनूठी बाहरी सतह पर आयनीकृत कणों का भी पता लगाया। यह सतह एक बेहद पतले वातावरण से बनी है जिसमें कण इतनी दूर हैं कि एक दूसरे से टकराने के बजाय वे सतह से टकरा जाते हैं। ग्रह की अंडाकार कक्षा इसका धीमा घूर्णन और कणों की सतह के साथ प्रतिक्रिया और सौर हवा के कारण तीव्र मौसमी और दिन रात संबंधी बदलाव होते हैं।

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