बुद्धि का विकास मानव के अस्तित्व का अंतिम लक्ष्य होना चाहिए - बी. आर. अम्बेडकर

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स्वामी विवेकानंद के सपनो का आदर्श युवक




दोस्तो आज हम स्वामी विवाकानंद के बारे में जानेंगे
स्वामी विवेकानंद के सपनो का युवक चाहिये ऐसा !
चेहरे पार तेज है

देह में शक्ती है

मन में उत्साह है

बुध्दी  में विवेक है

हुद्य में करुणा है

मातृभूमी पार प्रेम है

इंद्रिया पर संयम है

मन जिसका स्थिर है

आत्मविश्वास दुढ है

इच्छाशक्ती प्रबल है

स्वभाव जिसका नम्र है

सिंह जैसा निर्भय है

ध्येय जिसका उच्चां है

सत्य जिसका ईश्वर है

व्यसनो से जो मुक्त है

जीवन में अनुशासन है

वाणी जिसकी मधुर है

जातीभेद से परे है

गुरुजनो का आदर है

मात-पिता पर श्रद्धा है

दिन-दुखियो का मित्र है

सेवा में जो तत्पर है

ईश्वर में भक्ती है

जीवन में नीती है 

चारित्र्य जिसका शुद्ध है 

वही आदर्श युवक है

भारत को अंग्रेजी में इंडिया क्यों कहते है ?



दोस्तों आज का लेख बहुत दिनों बाद लिख रहा हु... समय की कमी के कारण लिख नहीं पाया.. पर आज का ले बहुत खास है क्युकी, आज है गणतंत्र दिवस ..... आप सभी को गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाये. ......

भारत को अंग्रेजी में इंडिया क्यों कहते है , यह सवाल शायद सबके मन में उठे होगे .
 लेकिन भारत को इंडिया इसलिए कहते है 

क्योकि स्वतंत्र, भारत के सविधान निर्माताओ ने इस शब्द को अंग्रेजों की विरासत के रूप में देश का दूसरा नाम स्वीकार किया.

गणेश - विघ्नहर्ता

दोस्तों आप सभी को गणेश चतुर्थीकी हार्दिक शुभकामनाये और आपसे वादा करता हु की आज से सारे लेख में खुद लिखुगा....आज में आपको गणपति के बारे के कुछ बताना चाहता हु....

विघ्न बाघाओं  को दूर करने और बुध्दी को सही मार्ग पर रखने वाली इश्वरी शक्ति का नाम है गणपति.
गणपति जी का चित्र कुछ अजीब सा है.. हाथी के समान  मुख, वक्रतुंड, एकदंत, मोटा पेट और वाहन चूहा.

उनका यह चित्र मनोवैज्ञानिक तत्वों से परिपूर्ण है.. वास्तव में इश्वर एक है और वह निराकार है, पर उस निराकार इश्वर का अनुभव योगी - रूशी, मुनि अपनी कुशाग्र बुघ्दी से कर सकते है, उस एक इश्वर की अनेक शक्तिया है, ये नाना शक्तिया ही हमारे तैतीस करोड़ देवी- देवता है.. प्रत्येक देवी-देवता एक मुख्य शक्ति का प्रतिक और मूर्तरूप है, आएये, 

बुघ्दी को सन्मार्ग पर स्थिर रखने वाली शक्ति गणपति के स्वरुप के बारे में विचार करे---उनका हाथी जैसा चोंडा मस्तक विवेक को प्रकट करता है.. जो मनुष्य को सोच- समजकर काम करने की प्रेरणा देता है..
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हाथी के दांत खाने के और दिखाने के और होते है. ये दांत यह प्रकट करते है की अपने काम में विघ्न न चाहने वाले व्यक्ति को चाहिए की वह सज्जन पुरुषो से तो उदारता का व्यवहार करे ही, पर अकारण हुए शत्रुओं  से सावधान रहते हुए अपना खुला विरोध न प्रकट होने दे, बल्कि दिखावे के दातो की तरह बाह्य व्यवहार शिष्ट रखे.

प्रेमचंद

  • भारत के उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद (जन्म- 31 जुलाई, 1880 - मृत्यु- 8 अक्टूबर, 1936) के युग का विस्तार सन 1880 से 1936 तक है। यह कालखण्ड भारत के इतिहास में बहुत महत्त्व का है। इस युग में भारत का स्वतंत्रता-संग्राम नई मंज़िलों से गुज़रा।
  • प्रेमचंद का वास्तविक नाम धनपत राय श्रीवास्तव था। वे एक सफल लेखक, देशभक्त नागरिक, कुशल वक्ता, ज़िम्मेदार संपादक और संवेदनशील रचनाकार थे। बीसवीं शती के पूर्वार्द्ध में जब हिन्दी में काम करने की तकनीकी सुविधाएँ नहीं थीं फिर भी इतना काम करने वाला लेखक उनके सिवा कोई दूसरा नहीं हुआ।

जन्म

प्रेमचंद का जन्म वाराणसी से लगभग चार मील दूर, लमही नाम के गाँव में 31 जुलाई, 1880 को हुआ। प्रेमचंद के पिताजी मुंशी अजायब लाल और माता आनन्दी देवी थीं। प्रेमचंद का बचपन गाँव में बीता था। वे नटखट और खिलाड़ी बालक थे और खेतों से शाक-सब्ज़ी और पेड़ों से फल चुराने में दक्ष थे। उन्हें मिठाई का बड़ा शौक़ था और विशेष रूप से गुड़ से उन्हें बहुत प्रेम था। बचपन में उनकी शिक्षा-दीक्षा लमही में हुई और एक मौलवी साहब से उन्होंने उर्दू और फ़ारसी पढ़ना सीखा। एक रुपया चुराने पर ‘बचपन’ में उन पर बुरी तरह मार पड़ी थी। उनकी कहानी, ‘कज़ाकी’, उनकी अपनी बाल-स्मृतियों पर आधारित है। कज़ाकी डाक-विभाग का हरकारा था और बड़ी लम्बी-लम्बी यात्राएँ करता था। वह बालक प्रेमचंद के लिए सदैव अपने साथ कुछ सौगात लाता था। कहानी में वह बच्चे के लिये हिरन का छौना लाता है और डाकघर में देरी से पहुँचने के कारण नौकरी से अलग कर दिया जाता है। हिरन के बच्चे के पीछे दौड़ते-दौड़ते वह अति विलम्ब से डाक घर लौटा था। कज़ाकी का व्यक्तित्व अतिशय मानवीयता में डूबा है। वह शालीनता और आत्मसम्मान का पुतला है, किन्तु मानवीय करुणा से उसका हृदय भरा है।

चाणक्य

  • कौटिल्य, चाणक्य एवं विष्णुगुप्त नाम से भी प्रसिद्ध हैं।
  • इनका व्यक्तिवाचक नाम विष्णुगुप्त, स्थानीय नाम चाणक्य (चाणक्यवासी) और गोत्र नाम कौटिल्य (कुटिल से) था।
  • ये चन्द्रगुप्त मौर्य के प्रधानमन्त्री थे।
  • इन्होंने 'अर्थशास्त्र' नामक एक ग्रन्थ की रचना की, जो तत्कालीन राजनीति, अर्थनीति, इतिहास, आचरण शास्त्र, धर्म आदि पर भली भाँति प्रकाश डालता है।
  • 'अर्थशास्त्र' मौर्य काल के समाज का दर्पण है, जिसमें समाज के स्वरूप को सर्वागं देखा जा सकता है।
  • अर्थशास्त्र से धार्मिक जीवन पर भी काफ़ी प्रकाश पड़ता है। उस समय बहुत से देवताओं तथा देवियों की पूजा होती थी। न केवल बड़े देवता-देवी अपितु यक्ष, गन्धर्व, पर्वत, नदी, वृक्ष, अग्नि, पक्षी, सर्प, गाय आदि की भी पूजा होती थी।